कुछ दिन पूर्व कलुआ की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था तब से कलुआ की जिंदगी ही बदल गयी थी। अस्पताल में स्टार रोगी की तरह इलाज चल रहा था। हर घण्टे खुद अस्पताल के अधीक्षक आ कर हाल चाल पूछ रहे थे। सामने टीवी पर कई न्यूज चैनल पर एंकर गला फाड़ कर दलित पिटाई का मुद्दा इतनी जोर शोर से उठा रहे थे कि खुद कलुआ ये भूल गया कि चोरी करने के दौरान कुछ लोगों ने उसे रंगेहाथ पकड़ कर पीट दिया था। एंकर से भी अधिक नेता लोग इस तरह चिल्ला रहे थे मानों कई सारे कौवे एक साथ काँव काँव कर रहे हों।
इधर कई पार्टी के नेताओं का कलुआ के पास आना जाना लगा हुआ था। मीडिया का जमावड़ा लगा हुआ था। कलुआ चोर रातों रात स्टार बन चुका था। अब थानेदार को ये समझ में नहीं आ रहा था कि कलुआ को चोरी के आरोप में गिरफ्तार करे या उसे पीटने वाले को गिरफ्तार करे।
कलुआ चोर की पिटाई राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका था। कई सारे संगठन कलुआ के प्रति इस तरह सहानुभूति बटोर रहे थे मानो कलुआ बॉर्डर पर जंग के दौरान घायल हुआ हो। हालांकि घायल सैनिकों के प्रति इन संगठनों ने शायद ही कभी सहानुभूति दिखाई हो।
दूर दराज के राज्यों के बड़े बड़े नेता भी कलुआ चोर के साथ फोटो खिंचवाने लाखों रूपये खर्च कर दौड़े चले आ रहे थे कि कहीं कलुआ ठीक हो कर अस्पताल से डिस्चार्ज ना हो जाय, और नेता जी का दलितप्रेम का अभिनय मीडिया में दिखाने से वंचित ना रह जाएँ।
कलुआ अपने जीवन में आये इस बदलाव से काफी उत्साहित था। अब उसे यकीन हो गया था कि गरीबी के कारण आज के बाद उसे चोरी चमारी का काम नहीं करना पड़ेगा। इतने बड़े बड़े नेता आ रहे हैं। कोई ना कोई तो उसे नौकरी मिल ही जायेगी। वो हाथ जोड़े सब से कहता रहा कि गरीब हूँ, कोई नौकरी दे दीजिये। सभी नेता सिर्फ एक ही बात कहते रहे कि आपके साथ जो जुल्म हुआ है वो सरकार की तानाशाही का परिचय देती है। कलुआ को नौकरी किसी नेता ने नहीं दिया।
कलुआ ठीक हो कर अस्पताल से डिस्चार्ज हो गया। पुलिस ने भी स्टार कलुआ पर केस कर के मुसीबत मोल लेना मुनासिब नहीं समझा। कलुआ बड़ी आस ले कर स्थानीय विधायक जी के घर के पास पहुँचा। विधायक जी से भेंट करना तो असम्भव ही था। किसी तरह उनके एक कार्यकर्ता से मुलाक़ात हो गयी। कार्यकर्ता से कलुआ ने विधायक जी से मिलने की गुहार लगाई। कार्यकर्ता ने कलुआ को झिड़की लगाते हुए कहा, "तुमको पुलिस केस से विधायक जी ने ही बचा दिया। अब और क्या?"
कलुआ ठीक हो कर अस्पताल से डिस्चार्ज हो गया। पुलिस ने भी स्टार कलुआ पर केस कर के मुसीबत मोल लेना मुनासिब नहीं समझा। कलुआ बड़ी आस ले कर स्थानीय विधायक जी के घर के पास पहुँचा। विधायक जी से भेंट करना तो असम्भव ही था। किसी तरह उनके एक कार्यकर्ता से मुलाक़ात हो गयी। कार्यकर्ता से कलुआ ने विधायक जी से मिलने की गुहार लगाई। कार्यकर्ता ने कलुआ को झिड़की लगाते हुए कहा, "तुमको पुलिस केस से विधायक जी ने ही बचा दिया। अब और क्या?"
कलुआ भौंचक था। आँखों में आंसू थे। मगर ये शारीरिक जख्म के दर्द की वजह से नहीं बल्कि ये सोच कर निकल आये थे कि उसके दो वक़्त की रोटी का इंतजाम यदि नेता जी किये होते तो कलुआ कभी चोरी चमारी नहीं करता।
कलुआ भौंचक था कि इस गरीब कलुआ की वजह से कितने अमीर नेताओं की राजनीति चमक रही है और ना जाने कितने टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ गयी है। लेकिन कलुआ की छः माह की बेटी की भूख किसी नेता को नहीं दिख रही है ना किसी चैनल में दिखाया जा रहा है।
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