सुबह का वक़्त हो रहा था. नवम्बर का पहला सफ्ताह था. सुबह सुबह हलकी ठण्ड थी. मैं अपने बालकनी में खड़े हो कर चाय की चुस्की ले रहा था और साथ साथ अखबार वाले का इन्तजार भी कर रहा था. जल्दी से अखबार पढ़ कर ऑफिस जाना था.
तभी मेरी नजर सडक के दूसरी तरफ एक बुजुर्ग पर पड़ी. कंधे पर बैग लटकाए हुए वो अपने हाथ में कागज का टुकडा पकड़ इधर उधर देख रहे थे. शायद वो उस कागज के टुकड़े में लिखे किसी पते की तलाश में थे.
किन्तु सुबह सुबह उन्हें कोई व्यक्ति मिल नहीं रहा था जो उनको पता बता सके.
मुझे लगा कि शायद मैं कुछ मदद कर सकता हूँ. मैंने उन्हें आवाज लगाईं और पूछा बाबा क्या खोज रहे हैं?
उन्होंने मेरी तरफ मुड़ कर कहा - मुझे डॉ0 महेश वर्मा के यहाँ जाना है. क्या आप उनका घर बता सकते हैं?
मुझे काफी आश्चर्य हुआ. क्यों कि डॉ0 महेश वर्मा वो हमारे पड़ोस में ही किराए के मकान में रहते थे और उनकी मृत्यु इसी वर्ष मार्च महीने में हो गयी थी. उनकी मृत्यु के कुछ दिन पश्चात् ही उनकी पत्नी अपने इंजीनियर बेटे रमेश के साथ बंगलौर चली गयी थी. उसके बाद वो इधर कभी नहीं आयीं. हालांकि वो मेरी पत्नी के फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में शामिल थी इसकी वजह से उनके फेसबुक अपडेट से उनकी बंगलौर में उनकी स्थिति के बारे में कभी कभी पता चल जाया करता था. वो अपने बेटे पोते के साथ खुश थी.
मैंने थोड़े निराशा के स्वर में उस बुजुर्ग को जवाब दिया कि - डाक्टर साहब तो अब नहीं रहे, उनका परिवार भी अब यहाँ नहीं रहता. आपको क्या काम था?
बुजर्ग ने हैरानी वाले स्वर में कहा - क्या, डाक्टर साहब गुजर गए? कब?
मैंने कहा - इसी साल, मार्च महीने में.
बुजुर्ग के चेहरे पर गहरी उदासी छा गयी. मुझे लगा कि मुझे उन्हें सहारा देना चाहिए. मैं नीचे आ गया और उनकी तरफ बढ़ा. वो बुजुर्ग काफी सदमे में लग रहे थे.
मैंने उनसे पूछा- आप कहाँ से आयें हैं, और कोई काम था क्या डाक्टर साहब से?
उन्होंने कहा - मैं जबलपुर से आया हूँ. वर्षों पहले जब डॉ साहब जबलपुर में थे तब उन्होंने मुझे मरने से बचाया था. मुझे नशा करने की बुरी लत लग चुकी थी. मेरा जीवन लगभग खत्म हो चुका था. तब डॉ0 वर्मा साहब ने ही मेरा इलाज किया था. उस वक़्त मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. लेकिन डाक्टर साहब ने मुझसे एक रुपया भी नहीं लिया था. उन्होंने मुझसे कहा था , जब ठीक हो कर कमाने लगना तब पैसे दे देना.
40 साल हो गए उस घटना को. डाक्टर साहब के इलाज के बाद मैं बिलकुल नशामुक्त हो गया और उसके बाद मैंने अपना कैरियर पर ध्यान दिया. किसी तरह से पूंजी इकठ्ठा कर बिजली उपकरण ठीक करने का एक छोटा सा दूकान खोला. भगवान की दया से और मेरी मेहनत से मेरी दूकान चल पड़ी और धीरे धीरे व्यापार बढाते बढाते जबलपुर का बड़ा आदमी बन गया. कई बार सोचा कि ये सब डाक्टर साहब की मेहरबानी है. वरना मैं तो मर ही जाता. कई बार मैं उनसे मिल कर उनकी फीस वापस करने की सोचा. लेकिन कभी काम धंधे ने मुझे फुर्सत ही नहीं दी. पिछले वर्ष मैंने अपना सारा कारोबार अपने बेटों को सौंप कर रिटायरमेंट का जीवन जीना शुरू कर दिया. अब मुझे लगा कि शायद अब वक्त आ गया है कि डाक्टर साहब का कर्ज चुका दूँ. काफी पता लगाते लगाते पता लगा कि डाक्टर साहब बनारस में शिफ्ट हो गए थे और वहीँ अपनी क्लिनिक चला रहे हैं.
और आज जब मैं यहाँ आया तो मुझे ये मनहूस खबर सुनने को मिली.
मैंने उस बुजुर्ग को सांत्वना दिया और अपने घर में बैठने का निमन्त्रण दिया. लेकिन वो बुजुर्ग मेरे घर में आने से इनकार कर दिया और वापस जबलपुर लौट जाने की बात कह कर धीमे क़दमों से वापस जाने लगे.
मैं उन्हें देख कर सोचता रहा कि सभी रिश्तों में भारी वो रिश्ता होता है जो रिश्ता किसी पर अहसान करके बनाया जाता है. दुसरे रिश्ते वाले भले ही अपने रिश्ते भूल जाते हैं लेकिन अहसान लेने वाला इंसान अहसान करने वाले इंसान के रिश्ते कभी नहीं भूल पाता है.
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