Thursday, 21 July 2016

प्लेटफॉर्म (लघुकथा)



"यात्रीगण कृपया ध्यान दें" उद्घोष के साथ ही मैं चौकन्ना हो जाता था। किन्तु मेरी ट्रेन के आने की कोई सुचना नहीं थी। पौने दो बजे जिस ट्रेन को खुल जानी चाहिए थी, वह ट्रेन अभी ढाई बजे तक भी लापता थी।

पूछताछ केंद्र पर तीसरी बार गया तो एक सरकारी बाबू अभी भी कान में टेलीफोन का चोंगा लगाये हुए यूँ बैठा था मानो अपनी प्रेमिका से बात कर रहा हो। खिड़की पर पहले से भी कई यात्री अपने अपने ट्रेन की सुचना पाने के लिए व्याकुल थे। सरकारी बाबू को यात्रियों से क्या मतलब? वो तो बस खिड़की पर बैठने की ही तनख्वाह उठा रहे थे।

मैं फिर से प्लेटफॉर्म पर भटकती आत्मा की भाँती विचरण करने लगा। प्लेटफॉर्म पर सैकड़ों नर नारी बैठे व खड़े थे। मैं सभी को निहारते हुए प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ता गया। अंत में लोग कम होते गए। प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर गरीब लोगों ने अपना बसेरा बसा लिया था। चीथड़ों में लिपटे हुए, मैले कुचैले अंग मानों वर्षो से नहाये ही नहीं हो। निर्धन हैं तो क्या नहा भी नहीं सकते? प्लेटफॉर्म के नल से  तो यूँ ही पानी बहते रहता है। 

निर्धन लोगों की जीवनी जानने की उत्सुकता और बढ़ गयी तो उनके थोडा और करीब चला आया। मैं यूँ प्रदर्शित कर रहा था मानो ट्रेन का इन्तजार कर रहा हूँ। लेकिन तिरछी निगाह से उन निर्धन लोगों को देख रहा था। वो लोग निर्धन होते हुए भी खुश नजर आ रहे थे। आपस में मजाक भी कर रहे थे। पास में ही एक बच्चा गन्दे प्लेट में भात और सब्जी खा रहा था। दो अन्य बच्चे प्लेटफॉर्म की जमीन पर लेट कर खेल रहे थे। महिलायें भी थी, जो बिना किसी लाज के पुरुषों के संग बैठ कर बीड़ी पी रही थी और किसी बहस में लीन थी। 

मैं उनके बहस पर थोडा ध्यान देने की कोशिश किया तो पता चला कि पिछली रात का कोई मामला था। शायद कोई पुरुष  किसी महिला के साथ रात को गायब हो गया था। उसी मुद्दे पर अब बहस हो रही थी। बहस बहुत गर्मागर्म नहीं थी बल्कि यूँ थी मानो आम बात है। 

निर्धनों के इस झुण्ड में शामिल उनलोगों के बीच का आपसी रिश्ते का अंदाज लगाना सम्भव नहीं था। शायद वो लोग रिश्ते नातों के बन्धन से मुक्त हो चुके हैं।

अचानक मैंने प्लेटफॉर्म से दूर पटरी पर ट्रेन को आती हुई देखा। निर्धनों की दुनिया से बाहर आ कर चौकन्ना हो गया। ट्रेन जब नजदीक आई तो देखा मेरी ही ट्रेन है। ट्रेन रुकी, लोग उतरे और मैं ट्रेन पर चढ़ा। तीन बज कर दस मिनट पर ट्रेन खुली और निर्धनों की दुनिया को प्लेटफॉर्म पर छोड़ कर मैं अपने गंतव्य को निकल पड़ा।

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