Saturday, 28 October 2017

रिश्ते


सुबह का वक़्त हो रहा था. नवम्बर का पहला सफ्ताह था. सुबह सुबह हलकी ठण्ड थी. मैं अपने बालकनी में खड़े हो कर चाय की चुस्की ले रहा था और साथ साथ अखबार वाले का इन्तजार भी कर रहा था. जल्दी से अखबार पढ़ कर ऑफिस जाना था. 

Thursday, 21 July 2016

भौंचक कलुआ (लघुकथा)

कुछ दिन पूर्व कलुआ की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया  था तब से कलुआ की जिंदगी ही बदल गयी थी। अस्पताल में स्टार रोगी की तरह इलाज चल रहा था। हर घण्टे खुद अस्पताल के अधीक्षक आ कर हाल चाल पूछ रहे थे। सामने टीवी पर कई न्यूज चैनल पर एंकर गला फाड़ कर दलित पिटाई का मुद्दा इतनी जोर शोर से उठा रहे थे कि खुद कलुआ ये भूल गया कि चोरी करने के दौरान कुछ लोगों ने उसे रंगेहाथ पकड़ कर पीट दिया था। एंकर से भी अधिक नेता लोग इस तरह चिल्ला रहे थे मानों  कई सारे कौवे एक साथ काँव काँव कर रहे हों।

प्लेटफॉर्म (लघुकथा)



"यात्रीगण कृपया ध्यान दें" उद्घोष के साथ ही मैं चौकन्ना हो जाता था। किन्तु मेरी ट्रेन के आने की कोई सुचना नहीं थी। पौने दो बजे जिस ट्रेन को खुल जानी चाहिए थी, वह ट्रेन अभी ढाई बजे तक भी लापता थी।

पूछताछ केंद्र पर तीसरी बार गया तो एक सरकारी बाबू अभी भी कान में टेलीफोन का चोंगा लगाये हुए यूँ बैठा था मानो अपनी प्रेमिका से बात कर रहा हो। खिड़की पर पहले से भी कई यात्री अपने अपने ट्रेन की सुचना पाने के लिए व्याकुल थे। सरकारी बाबू को यात्रियों से क्या मतलब? वो तो बस खिड़की पर बैठने की ही तनख्वाह उठा रहे थे।